Friday, 25 August 2017

संकटनाशनगणेशस्तोत्रम् II Sankatganganesh Sutramam II www.sbvktrust.org

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पुष्प ठाकुर जी महाराज

संकटनाशनगणेशस्तोत्रम् 

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये ॥ १॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ ३॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः ॥ ५॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥ ७॥

अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८॥


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पुष्प ठाकुर जी महाराज

संकटनाशनगणेशस्तोत्रम् अर्थ 

1- नारद जी बोले पार्वती नन्दन श्री गणेशजी को सिर झुकाकर प्रणाम करें
    और फिर अपनी आयु , कामना और अर्थ की सिद्धि के लिये
    उन भक्तनिवास का नित्यप्रति स्मरण करें ।।

2- पहला वक्रतुण्ड टेढे मुखवाले, दुसरा एकदन्त एक दाँतवाले,
    तीसरा कृष्ण पिंगाक्ष काली और भूरी आँख वाले,
    चौथा गजवक्र हाथी के से मुख वाले ।।

3- पाँचवा लम्बोदरं बड़े पेट वाला, छठा विकट (विकराल),
    साँतवा विघ्नराजेन्द्र (विध्नों का शासन करने वाला राजाधिराज)
    तथा आठवाँ धूम्रवर्ण (धूसर वर्ण वाले) ।।

4- नवाँ भालचन्द्र जिसके ललाट पर चन्द्र सुशोभित है,
    दसवाँ विनायक, ग्यारवाँ गणपति और बारहवाँ गजानन ।।

5- इन बारह नामों का जो मनुष्य तीनों सन्धायों (प्रातः, मध्यान्ह और सांयकाल)
    में पाठ करता है, हे प्रभु ‍! उसे किसी प्रकार के विध्न का भय नहीं रहता,
    इस प्रकार का स्मरण सब सिद्धियाँ देनेवाला है ।।

6- इससे विद्याभिलाषी विद्या, धनाभिलाषी धन, पुत्रेच्छु पुत्र तथा
    मुमुक्षु मोक्षगति प्राप्त कर लेता है ।।

7- इस गणपति स्तोत्र का जप करे तो छहः मास में इच्छित फल
    प्राप्त हो जाता है तथा एक वर्ष में पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है
    इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।।

8- जो मनुष्य इसे लिखकर आठ ब्राह्मणों को समर्पण करता है,
    गणेश जी की कृपा से उसे सब प्रकार की विद्या प्राप्त हो जाती है ।।
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Thursday, 24 August 2017

Hartalika Teej Vrat Katha II हरतालिका तीज व्रत कथा II sbvktrust.org

हरतालिका तीज व्रत पूजन सामग्री:-

बालू या मिट्टी ( गौरी-शंकर बनाने के लिये) पान का पत्ता , सुपारी , लौंग ,इलायची , गुड़ , धूप , दीप, अक्षत ,चंदन ,सिंदूर , फूल, बेल पत्र , आक/मदार के फूल , भांग , धतूरा , दूर्वा , नैवेद्य(घरेलु परम्परा के अनुसार)  ,लकड़ी का चौकी या पटरा- 1
कपड़ा – 3, ( 2 लाल और एक सफेद या हरा) , फल ,गंगा जल , शुद्ध जल ,लोटा , कपूर , घी ,मिट्टी का दीपक (अखण्ड दीप)
केले के चार पत्ते (मण्डप बनाने के लिये)

हरतालिका तीज व्रत कथा ..

एक बार भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से हरतालिका तीज व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।
भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा- एक बार जा तुमने हिमालय पर्वत पर जाकर गंगा के किनारे, मुझे पति रुप में प्राप्त करने के लिये कठिन तपस्या की थी. उसी घोर तपस्या के समय नारद जी हिमालय के पास गये तथा कहा की विष्णु भगवान भगवान आपकी कन्या के साथ विवाह करना चाहते है. इस कार्य के लिये मुझे भेजा है.
नारद की इस बनावटी बात को तुम्हारे पिता ने स्वीकार कर लिया, तत्पश्चात नारद जी विष्णु के पास गये और कहा कि आपका विवाह हिमालय ने पार्वती के साथ करने का निश्चय कर लिया है. आप इसकी स्वीकृ्ति दें. नारद जी के जाने के पश्चात पिता हिमालय ने तुम्हारा विवाह भगवान विष्णु के साथ तय कर दिया है.
यह जानकर तुम्हें, अत्यंत दु: हुआ. और तुम जोर-जोर से विलाप करने लगी. एक सखी के साथ विलाप का कारण पूछने पर तुमने सारा वृ्तांत कह सुनाया कि मैं भगवान शंकर के साथ विवाह करने के लिए कठिन तपस्या प्रारक्भ कर रही हूं, उधर हमारे पिता भगवान विष्णु के साथ संबन्ध तय करना चाहते है. मेरी कुछ सहायता करों, अन्यथा मैं प्राण त्याग दूंगी.
सखी ने सांत्वना देते हुए कहा -मैं तुम्हें ऎसे वन में ले चलूंगी की तुम्हारे पिता को पता चलेगा. इस प्रकार तुम सखी सम्मति से घने जंगल में गई. इधर तुम्हारे पिता हिमालय ने घर में इधर-उधर खोजने पर जब तुम्हें पाया तो बहुत चिंतित हुए क्योकि नारद से विष्णु के साथ विवाह करने की बात वो मान गये थे.
वचन भंग की चिन्ता नें उन्हें मूर्छित कर दिया. तब यह तथ्य जानकर तुम्हारी खोज में लग गयें. इधर सखी सहित तुम सरिता किनारे की एक गुफा में मेरे नाम की तपस्या कर रही थी. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृ्तिया तिथि का उपवास रहकर तुमने शिवलिंग पूजन तथा रात्रि जागरण भी किया.
इससे मुझे तुरन्त तुम्हारे पूजर स्थल पर आना पडा. तुम्हारी मांग और इच्छा के अनुसार तुम्हें, अर्धांगिनी रुप में स्वीकार करना पडा. प्रात:बेला में जब तुम पूजन सामग्री नदी में छोड रही थी तो उसी समय हिमालय राज उस स्थान पर पहुंच गयें. वे तुम दोनों को देखकर पूछने लगे कि बेटी तुम यहां कैसे गई. तब तुमने विष्णु विवाह वाली कथा सुना दी.
यह सुनकर वे तुम्हें लेकर घर आयें और शास्त्र विधि से तुम्हारा विवाह मेरे साथ कर दिया. उस दिन जो भी स्त्री इस व्रत को परम श्रद्वा से करेगी, उसे तुम्हारे समान ही अचल सुहाग मिलेगा.

एक बार भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।
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Friday, 18 August 2017

श्री राधा विजयते नमः !! पुष्प ठाकुर जी महाराज !! www.sbvktrust.org

श्री राधा कृपा-कटाक्ष !! श्री राधा विजयते नमः !! 
1. मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी !
    व्रजेन्द्रभानुनंदनी व्रजेन्द्र सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम् !!
अर्थ - मुनीन्द वृंद जिनके चरणों की वंदना करते हैं तथा जो तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं मुस्कानयुक्त प्रफुलिलत मुख कमलवाली,निकुंज भवन में विलासकरनेवाली,राजा वृषभानु की राजकुमारी,श्रीब्रजराजकुमारकी ह्दयेश्वरी श्रीराधिके!कब मुझे अपने कृपा कटाक्ष का पात्र बनाओगी ?
2. अशोकवृक्षवल्लरी, वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ्कोमले !
    वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष -भाजनम् !!

अर्थ - अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए 'लता मंदिर' में विराजमान और मूँगे अग्नि नवीन लाल पल्लवों के समान अरूण कांतियुक्त कोमल चरणोंवाली,भक्तों को अभीष्ट वरदान देनेवाली तथा अभयदान देने के लिए उत्सुक रहनेवाले कर कमलों वाली अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी श्री राधे मुझे कब अपने कृपा कटाक्ष का अधिकारी बनाओगी.
3. अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां , सुविभ्रुमं ससम्भ्रुमं दृगन्तबाणपातनैं: !
    निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने , कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् !!

अर्थ- प्रेम कीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में बाँकी भृकुटी करके, आश्चयर्य उत्पन्न करते हुए सहसा कटाक्ष रूपी वाणों की वर्षा सेश्रीनन्दनन्दन को निरंतर बस में करनेवाली हे सरवेश्वरी! अपने कृपा कटाक्ष का पात्र मुझे कब बनाओगी ?
4. तड़ित्सुवर्णचम्पक प्रदीप्तगौरविग्रहे, मुखप्रभापरास्त-कोटिशारदेन्दुमण्ङले !
    विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशावलोचने , कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् !!

अर्थ - बिजली,स्वर्ण तथा चम्पा के पुष्प के समान सुनहरी कांति से देदीप्यमान गोरेअंगोंवाली अपने मुखारविंद की चाँदनी से करोड़ों शरच्चंदों को जीतनेवाली, क्षण-क्षण में विचित्र चित्रों की छटा दिखानेवाले चंचल चकोर के बच्चे के सदृश विलोचनों वाली, हे जगज्जननी !क्या कभी मुझे अपने कृपाकटाक्ष का अधिकारी बनाओगी.
5. मदोन्मदातियौवने प्रमोद मानमण्डिते, प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपण्डिते !
    अनन्यधन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम् !!

अर्थ- अपने अत्यंत रूप-यौवन के मद से मत रहनेवाली आनंद भरा मन ही जिनका सवोतम भूषण है,प्रियतम के अनुराग रंगी हुई, विलास की प्रवीणअनन्य भक्त गोपिकाओं से धन्य हुए निकुंजराज्य के प्रेम कौतुक विघा की विदुषी श्रीराधिके! मुझे अपने कृपा कटाक्ष का पात्र कब बनाओगी.
6. अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते ,प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुम्भिकुम्भसुस्तनी !
    प्रशस्तमंदहास्यचूर्णपूर्णसौख्यसागरे, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम् !!

अर्थ- संपूर्ण हाव- भावरूपी श्रृंगारों तथा धीरता एंव हीरे की हारों से विभूषित अंगोंवाली शुद्ध स्वर्ण के कलशों के समान एंव गयनि्दनी के गंडस्थल के समान मनोहर पयोंधरोंवाली प्रशांसित मंद मुस्कान से परिपूण आंनद सिंधु के सदृश श्रीराधे !क्या मुझे कभी अपनी कृपा दृषि्ट से कृतार्थ करोगी ?
7. मृणालबालवल्लरी तरंगरंगदोर्लते , लताग्रलास्यलोलनील लोचनावलोकने
    ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रये , कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्!!

अर्थ- जल की लहरों से हिलते हुए कमल के नवीन नाल के समान जिनकी कोमल भुजाएँ हैं पवन से जैसे लता का एक अग भाग नाचता है, ऐसे चंचल लोंचनों से नीलिमा झलकाते हुए जो अवलोकन करती हैं ललचाने वाले,लुभाकर पीछे-पीछे फिरनेवाले, मिलन में मन को हरनेवाले मुग्ध मनमोहन को आश्रय देनेवाली,हे वृषभानु किशोरी! कब अपने कृपा अवलोकन द्वारा मुझे माया जाल से छुड़ाओगी.
8. सुवर्णमलिकांचितेत्रिरेखकुम्बेकण्ठगे, त्रिसूत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्तिदीधिति !
    सलोलनीलकुन्तले प्रसुन्गुच्छगुम्फिते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम् !!

अर्थ - स्वर्ण की मालाओ से बिभूषित और तीन रेखाओ वाले शंख की छटा सदृश सुन्दर कंठ वाली और तीन जिनकेकंठ में मंगल मय त्रिसूत्र बंधा हुआ है, जिनमे तीन रंग के रत्नों का भूषण लटक रहा है, रत्नों से देदीप्यमान किरणे निकल रही है. दिव्य पुष्पों के गुच्छों से गूँथे हुए काले घुँघराले लहराते केशोवाली हें सर्वेश्वरी! श्री राधे कब मुझे अपनी कृपा द्रष्टि से देखकर अपने चरण कमलों के दर्शन का अधिकारी बनाओगी .
9. नितंबोंबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण, प्रशस्रत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले !
    करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके ,कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्!!

अर्थ - कटिमंडल में माणिमय किंकिणी सुशोभित है जिसमे सोने के फूल रत्नों से जड़े हुए लटक रहे है और उसकी प्रशसनीय झंकार अत्यंत मनोहर गजेन्द्र की सूंड के समान जिनकी जंघाए अत्यंत सुन्दर है ऐसी श्री राधे मुझ पर कृपा करके कब संसार सागर से पार लगाओगी.
10. अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत् , समाजराजहंसवंश निक्वणातिगौरवे !
      विलोलहेमवल्लरी विडम्बीचारूचंक्रमे , कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम् !!

अर्थ - अनेकों वेदमंत्रो की सुमधुर झनकार करनेवाले स्वर्णमय नूपुर चरणों में ऐसे प्रतीत होते हैं! मानो मनोहर हसों की पंकि्त गूँज रही हो, चलते समय अंगों की छवि है! ऐसी लगती मानो स्वर्णलता लहरा रही हो ! हे जगदीश्वरी श्रीराधे!क्या कभी मैं आपके चरण- कमलों का दास हो सकूँगा?
11. अनन्तकोटिविष्णुलोक - नम्रपद्ममजार्चीते , हिमाद्रिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे !
      अपारसिद्धिवृद्धिदिग्ध - सत्पदांगुलीनखे , कदा करिष्यसीह मां कृपा -कटाक्ष भाजनम् !!

अर्थ - अनंत कोटि बैकुंठो की स्वामिनी श्रीलक्ष्मी जी आपकी पूजा करती हैं तथा श्रीपार्वती जी, इन्द्राणी जी और सरस्वती जी ने भी आपकी पूजा कर वरदान पाया है ! आपके चरण- कमलों की एक उंगली के नख का भी ध्यान करने मात्र से अपार सिद्धि का समूह बढ़ने लगता है! हे करूणामयी! आप कब मुझ को वात्सल्य-रस भरी दृषि्ट से देखोगी.
12. मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी , त्रिवेदभारतीयश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी !
      रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी , ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते !!
अर्थ- सब प्रकार के यज्ञों की आप स्वामिनी हैं! संपूर्ण क्रियाओं की स्वामिनी, स्वधादेवी की स्वामिनी सब देवताओं की [ॠग,यजु ,साम] स्वामिनी प्रमाण शासन शास्त्र की स्वामिनी, श्रीरमा देवी की स्वामिनी , श्रीक्षमा देवी की स्वामिनी और [अयोध्या के] प्रमोद वन की स्वामिनी [श्रीसीता ] आप ही हैं हे राधिके ! कब मुझे कृपा कर अपनी शरण में स्वीकार कर पराभकि्त प्रदान करोगी? हे ब्रजेश्वरी!हे ब्रज की अधीष्ठात्री श्रीराधिके! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है.
13. इतीदमद्भुतस्तवं निशम्य भानुनंदनी , करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष -भाजनम् !
      भवेत्तदैव संचित-त्रिरूपकर्मनाशनं , लभेत्तदाब्रजेन्द्रसूनु -मण्डलप्रवेशनम् !!

अर्थ- हे वृषाभानुनंदिनी! मेरी इस विचित्र स्तुति को सुनकर सर्वदा के लिए मुझ दास को अपनी दयादृषि्ट का अधिकारी बना लो बस आपकी दया दृषि्ट का अधिकारी बना लो बस आपकी दया ही से तो मेरे [प्रारब्ध संचित और क्रियामाण] इन तीनों प्रकार के कर्मों का नाश हो जाएगा और उसी क्षण श्रीकृष्ण के नित्य मंडल [दिव्यधाम की लीलाओं में] सदा के लिए प्रवेश हो जाएगा.
14. राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धया ,एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधी !
      यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति साधकः, राधाकृपाकटाक्षेण भक्ति : स्यात् प्रेमलक्षणा !!

अर्थ - पूर्णिमा के दिन,शुक्लपक्ष की अष्टमी या दशमी को तथा दोनों की एकादशी और त्रयोदशी को जो शुद्ध बुद्धिवाला भक्त इस- स्त्रोत का पाठ करेगा वह जो भावना करेगा वही प्राप्त होगा, अन्यथा निष्काम भावना से पाठ करने पर श्रीराधाजी की दयादृष्टि से पराभक्ति प्राप्त होगी.
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Friday, 11 August 2017

भक्ति क्या है !! पुष्प ठाकुर जी महाराज !! Shradha Bhakti Viswa Kalyan Trust || Prayag .






















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"भक्ति" हाथ पैरो से नहीं होती है। वर्ना विकलांग कभी नहीं कर पाते।

भक्ति ना ही आँखो से होती है । वर्ना सूरदास जी कभी नहीं कर पाते।

ना ही भक्ति बोलने सुनने से होती है वर्ना "गूँगे" "बैहरे" कभी नहीं कर पाते।

ना ही "भक्ति" धन और ताकत से होती है वर्ना गरीब और कमजोर कभी नहीं कर पाते।

"भक्ति" केवल  भाव से होती है एक अहसास है "भक्ति" 

जो हृदय से होकर विचारों में आती है और हमारी आत्मा से जुड़ जाती है।


"भक्ति" भाव का सच्चा सागर है। 

Thursday, 10 August 2017

!! कौन से ऋषि का क्या है महत्व !! Prayag Sewa Dham !! TIRTH RAJ PRAYAG || WWW.SBVKTRUST.ORG SHRADHA BHAKTI VISWA KALYAN TRUST , PUSHP THAKUR JI MAHARAJ (PRAYAG)


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WWW.SBVKTRUST.ORG SHRADHA BHAKTI VISWA KALYAN TRUST, PUSHP THAKUR JI MAHARAJ (PRAYAG)          !! कौन से ऋषि का क्या है महत्व !! 

अंगिरा ऋषि - ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

विश्वामित्र ऋषि - गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

वशिष्ठ ऋषिऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

कश्यप ऋषि - मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

जमदग्नि ऋषि- भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

अत्रि ऋषिसप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

अपाला ऋषिअत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

नर और नारायण ऋषिऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

पराशर ऋषिऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

भारद्वाज ऋषिबृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महानऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

वेदों के रचयिता ऋषि  -  ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- .वशिष्ठ, .विश्वामित्र, .कण्व, .भारद्वाज, .अत्रि, .वामदेव और .शौनक।

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-

वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

 अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

. वशिष्ठराजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

. विश्वामित्रऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

. कण्व - माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

. भारद्वाजवैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

. अत्रिऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

. वामदेववामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

. शौनकशौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है। 

    !!!  जय श्रीराम !! पुष्प ठाकुर जी महाराज !!

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